State Capex India: SBI रिसर्च की रिपोर्ट में खुलासा: पंजाब, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों पर बढ़ता कर्ज और मुफ्त की योजनाएं विकास की रफ्तार को धीमा कर रही हैं। जानें क्या है पूरा मामला।
मुंबई, 22 अप्रैलः SBI रिसर्च की नवीनतम रिपोर्ट ने भारतीय राज्यों की वित्तीय सेहत पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा SASCI योजना के तहत दी जा रही भारी वित्तीय मदद के बावजूद, पंजाब, केरल और तेलंगाना जैसे कर्ज में डूबे राज्य विकास की रफ्तार को धीमा कर रहे हैं। इन राज्यों का बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान और मुफ्त की योजनाओं में खर्च हो रहा है, जिससे नई सड़कों और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए फंड की कमी हो रही है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च (Capex) में कम से कम 30 प्रतिशत की हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं की, तो देश के आर्थिक विकास का लक्ष्य अधूरा रह सकता है। विकास के इस असंतुलन को दूर करने के लिए राज्यों को अपनी वित्तीय नीतियों में बड़े बदलाव करने की जरूरत है।
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। केंद्र सरकार का लक्ष्य देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने का है, लेकिन इस सपने की राह में एक बड़ा रोड़ा सामने आ रहा है। यह रोड़ा है भारतीय राज्यों की माली हालत। SBI रिसर्च की एक ताजा और विस्तृत रिपोर्ट ने देश के विकास की रफ्तार को लेकर कुछ चौंकाने वाले संकेत दिए हैं।
रिपोर्ट का सार यह है कि केंद्र सरकार तो अपनी तरफ से राज्यों को विकास के लिए दिल खोलकर पैसा दे रही है, लेकिन कई राज्य उस पैसे का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। केरल से लेकर पंजाब तक, कई राज्य कर्ज के ऐसे मकड़जाल में फंसे हैं कि उनका ध्यान भविष्य के विकास (Infrastructure) के बजाय पुराने खर्चों को संभालने में ही लगा हुआ है।
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5 साल में 4.5 लाख करोड़ की मदद, फिर भी क्यों सुस्त है रफ्तार?
पिछले 5 वर्षों के दौरान, केंद्र सरकार ने 'राज्यों को पूंजीगत निवेश के लिए विशेष सहायता' (SASCI) योजना के तहत लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए। इस भारी-भरकम राशि का उद्देश्य यह था कि राज्य अपने यहां नई सड़कें, पुल, बिजली घर और अस्पताल बनवाएं ताकि रोजगार पैदा हो और राज्य की जीडीपी बढ़े।
शुरुआती सालों में तो तस्वीर बहुत अच्छी थी। लगभग सभी राज्यों ने इस पैसे का 100% इस्तेमाल किया। लेकिन 2023-24 और 2024-25 के आंकड़ों को देखें तो एक बड़ी खाई नजर आती है। कुछ राज्य तो विकास की रेस में दौड़ रहे हैं, जबकि कुछ कर्ज और प्रशासनिक खामियों की वजह से पिछड़ गए हैं।
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कर्ज का दलदल: पंजाब, केरल और तेलंगाना की कहानी
SBI की रिपोर्ट में पंजाब, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों का विशेष जिक्र किया गया है। इन राज्यों की सबसे बड़ी समस्या इनका 'कर्ज और जीडीपी अनुपात' (Debt-to-GSDP Ratio) है। आसान भाषा में कहें तो, इन राज्यों की जितनी कमाई नहीं है, उससे कहीं ज्यादा इन पर कर्ज है।
जब किसी राज्य पर कर्ज ज्यादा होता है, तो उसकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा ‘राजस्व खर्च' (Revenue Expenditure) में चला जाता है। इसमें शामिल हैं:
- पुराने कर्ज का ब्याज चुकाना।
- सरकारी कर्मचारियों का वेतन।
- पेंशन का भुगतान।
- बिजली और अन्य चीजों पर दी जाने वाली सब्सिडी।
जब बजट का 70-80% हिस्सा इन्हीं कामों में खर्च हो जाता है, तो विकास कार्यों यानी 'पूंजीगत खर्च' (Capex) के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है। यही वजह है कि पंजाब जैसे राज्यों में SASCI फंड का इस्तेमाल एक समय में गिरकर महज 6.5% तक पहुंच गया था।
मुफ्त की योजनाओं (Freebies) का बढ़ता दबाव
रिपोर्ट में एक और चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा किया गया है ‘डायरेक्ट कैश ट्रांसफर' या मुफ्त की योजनाएं। झारखंड, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में ऐसी योजनाओं पर खर्च तेजी से बढ़ रहा है जहां सरकार सीधे लोगों के खातों में पैसे डाल रही है।
हालांकि, सामाजिक कल्याण के लिए यह जरूरी हो सकता है, लेकिन अर्थशास्त्र के नजरिए से इसके गंभीर परिणाम हो रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि जब राज्य अपना पैसा इन 'लोकप्रिय' योजनाओं में लगा देते हैं, तो वे विकास के लिए पूरी तरह केंद्र के भरोसे हो जाते हैं। वे खुद से कोई बड़ा निवेश नहीं कर पा रहे हैं। इसे आर्थिक भाषा में "प्रतिस्थापन" (Substitution) कहा जाता है, यानी राज्य अपना पैसा बचाने के लिए केंद्र के फंड का सहारा ले रहे हैं और अपने पैसे को चुनावी वादों में खर्च कर रहे हैं।
आंकड़ों की जुबानी: कौन सा राज्य कहां खड़ा है?
अगर हम राज्यों के प्रदर्शन पर नजर डालें, तो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों ने केंद्र से मिले फंड का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। इनका यूटिलाइजेशन रेट (उपयोग दर) लगातार 90% से ऊपर बना हुआ है।
| राज्य | 2020-21 | 2021-22 | 2022-23 | 2023-24 | 2024-25 |
|---|---|---|---|---|---|
| आंध्र प्रदेश | 100.0% | 100.0% | 97.0% | 93.9% | 81.5% |
| अरुणाचल प्रदेश | 46.4% | 100.0% | 86.4% | 83.2% | 76.9% |
| असम | 100.0% | 100.0% | 86.7% | 71.6% | 80.9% |
| बिहार | 100.0% | 77.1% | 91.7% | 78.7% | 74.4% |
| छत्तीसगढ़ | 100.0% | 100.0% | 63.0% | 90.9% | 94.4% |
| गोवा | 100.0% | 100.0% | 100.0% | 68.6% | 77.8% |
| गुजरात | 100.0% | 66.7% | 89.5% | 87.8% | 89.8% |
| हरियाणा | 100.0% | 66.7% | 96.2% | 90.6% | 82.4% |
| झारखंड | 41.0% | 39.9% | 80.0% | 83.0% | 66.7% |
| कर्नाटक | 100.0% | 100.0% | 95.4% | 77.2% | 92.4% |
| केरल | 50.0% | 100.0% | 48.9% | 71.2% | 69.7% |
| मध्य प्रदेश | 100.0% | 98.7% | 99.3% | 97.4% | 94.3% |
| महाराष्ट्र | 100.0% | 92.4% | 85.8% | 80.8% | 95.0% |
| मणिपुर | 76.2% | 96.3% | 44.7% | 35.7% | 47.4% |
| मेघालय | 90.6% | 100.0% | 87.8% | 78.4% | 85.8% |
| मिजोरम | 100.0% | 100.0% | 59.8% | 57.2% | 79.3% |
| नागालैंड | 100.0% | 100.0% | 100.0% | 80.8% | 51.7% |
| ओडिशा | 90.7% | 87.1% | 100.0% | 63.7% | 90.6% |
| पंजाब | 100.0% | 60.6% | 32.9% | 6.5% | 84.3% |
| राजस्थान | 94.6% | 92.7% | 99.5% | 91.8% | 93.4% |
| सिक्किम | 100.0% | 100.0% | 100.0% | 84.7% | 84.6% |
| तमिलनाडु | 100.0% | 100.0% | 95.4% | 85.7% | 79.3% |
| तेलंगाना | 86.9% | 100.0% | 84.9% | 71.7% | 57.5% |
| त्रिपुरा | 67.2% | 77.8% | 38.8% | 73.8% | 86.6% |
| उत्तर प्रदेश | 100.0% | 36.9% | 54.5% | 86.7% | 87.9% |
| उत्तराखंड | 84.6% | 75.4% | 95.8% | 88.5% | 71.6% |
| पश्चिम बंगाल | 100.0% | 96.2% | 54.6% | 66.7% | 96.7% |
दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य ने 2021-22 में केवल 36.9% फंड का उपयोग किया था, हालांकि बाद में इसमें सुधार हुआ और यह 87.9% तक पहुंच गया। पूर्वोत्तर के राज्यों, जैसे मणिपुर और नागालैंड में भी फंड के इस्तेमाल में भारी गिरावट देखी गई है, जो वहां की अस्थिरता और भौगोलिक चुनौतियों को दर्शाता है।
युवा आबादी बनाम बुजुर्ग आबादी: एक दिलचस्प पहलू
SBI रिसर्च ने एक और अनोखा विश्लेषण किया है। जिन राज्यों में युवा आबादी (Young Demographic) अधिक है, वहां विकास कार्यों पर खर्च करने की इच्छाशक्ति और क्षमता अधिक देखी गई है। इसके उलट, जिन राज्यों में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, वहां पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च का दबाव अधिक है, जिससे विकास के लिए पैसा कम बचता है।
क्या है समाधान? SBI रिसर्च की सलाह
रिपोर्ट सिर्फ कमियां ही नहीं गिनाती, बल्कि सुधार का रास्ता भी बताती है। रिपोर्ट के अनुसार:
- साझेदारी जरूरी है: विकास का असली असर तब दिखेगा जब राज्य सिर्फ केंद्र के पैसे पर निर्भर न रहें। अगर राज्य हर प्रोजेक्ट में कम से कम 30% हिस्सा अपनी जेब से लगाएं, तो विकास की रफ्तार दोगुनी हो सकती है।
- शर्तों वाले फंड (Conditional Grants): रिपोर्ट कहती है कि बिना शर्त मिलने वाला पैसा अक्सर अन्य खर्चों में उड़ जाता है। इसलिए, फंड को विशिष्ट प्रोजेक्ट्स (जैसे स्मार्ट सिटी या नेशनल हाईवे) से जोड़ना ज्यादा फायदेमंद होता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि पैसा सिर्फ विकास में ही लगेगा।
- राजस्व प्रबंधन: राज्यों को अपने कर संग्रह (Tax Collection) को सुधारना होगा और मुफ्त की योजनाओं और दीर्घकालिक विकास के बीच संतुलन बनाना होगा।
भारत के विकास का इंजन तभी पूरी रफ्तार से दौड़ सकता है जब केंद्र और राज्य दोनों इसके पहिए बनें। केंद्र सरकार पैसा दे रही है, लेकिन राज्यों को अपनी प्रशासनिक क्षमता सुधारनी होगी और कर्ज के जाल से बाहर निकलना होगा। पंजाब और केरल जैसे राज्यों के लिए यह एक 'वेक-अप कॉल' है। अगर समय रहते पूंजीगत खर्च पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बुनियादी ढांचे और रोजगार की भारी कमी हो सकती है।
अंततः, विकास केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि जमीन पर बनी सड़कों, चलते हुए कारखानों और बेहतर स्कूलों में दिखना चाहिए। और इसके लिए राज्यों को अपनी 'जेब ढीली' करनी ही होगी।
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